"कोहकन"
ऐ मेरे कोहकन
कोह कनी छोड़ दे
कोहसारों से आगे भी
दुनियाँ है एक
मानता हूँ कि तेरी हथेली ने
कितने ही कोहसार
रेज़ा रेज़ा किए
शहर के सब मकानों की
तामीर में तेरा हिस्सा भी है
तू ने चट्टान काटी तो बरसो
स तरसे हुए संग, मरमरीं हो गए
आज महलो की ज़ीनत बने हैं मगर
कोई भी तो नहीं जो इन्हे देख कर
तेरा चर्चा करे
ऐ मेरे कोहकन
कोहकनी छोड़ दे
— Salman Yusuf















