इक तू जो सफ़र पर से पलटकर नहीं आया
फिर मैं भी कभी शाम ढले घर नहीं आया
मुद्दत हुई एक शख़्स को रूठे हुए मुझ से
मुद्दत हुई इस छत पे कबूतर नहीं आया
मस्जिद को सभी जाते हैं एहसान जताकर
मयख़ाने में कोई भी बता कर नहीं आया
कोशिश तो बहुत की कि तेरा नाम न आए
मज़मून तेरे ज़िक्र से बाहर नहीं आया
एहसान हैं अहबाब के हम पर ये वगरना
दुश्मन की तरफ़ से कोई पत्थर नहीं आया
हक़ वालों का शेवा है कि आ जाते हैं वरना
मक़्तल में कोई ख़ुद से तो चल कर नहीं आया
वैसे तो सभी आप की नज़रों से मरे हैं
इल्ज़ाम कभी आप के सरपर नहीं आया
— Salman Yusuf















