"इक आस"
उम्मीदें सिसकियाँ लेती हैं
दिल के गहरे कोने में
तसल्ली धड़कनें देती हैं
नाज़ुक हाथ की मानिंद
पलक पर अश्क के मेले
यहाँ हर रोज़ लगते हैं
लबों पर प्यास की शम्में
यहाँ हर शाम जलती हैं
मुसलसल दर्द बहता है
तो पलकें भीग जाती हैं
हुजूम-ए-आदमीयत में
फ़क़त मैं ही हूँ तन्हा सा
कटे से पैरहन पर कुछ
पुराने छींट के धब्बे
यही पैग़ाम देते हैं
मुझे दुनिया से नफ़रत है
मैं एक बोसीदा सी
टूटी हुई दीवार के भीतर
ख़ुद अपने आप के साए से
यूँ ही लिपटा रहता हूँ
हक़ीक़त में मैं ख़ुद इक
लाश की मानिंद हूँ लेकिन
अभी कुछ साँस बाक़ी हैं
अभी इक आस बाक़ी है
कि तुम फिर लौट आओगे
कि तुम फिर लौट आओगे















