लिखना ज़रूरी है

लिखो
लिखना ज़रूरी है
मगर लिखने से पहले
ये अख़ज़ कर लो
कि क्या लिखना ज़रूरी है
वही जो कुछ तुम्हारे दरमियाँ में
घट रहा है
मुहब्बत का गला क्यूँ कट रहा है
समाज बँट रहा है
अख़ुव्वत आजिज़ी और इंकिसारी
स भरा बादल
फ़ज़ा में नफ़रतों की घुल रहा है
छँट रहा है
मुहाफ़िज़ इस्मतों के
इस्मतों का क़त्ल करते हैं
अमीर-ए-शहर ग़रीबों के लहू से
पेट भरते हैं
लिखो
लिखना ज़रूरी है
लिखो अब बे-हयाई ने फ़्रीडम नाम रखा है
जो ज़िल्लत ख़त्म होनी थी
उसी को थाम रखा है
हमारे मुंसिफ़ों ने ही हमारे सर
हमारे क़त्ल का इल्ज़ाम रखा है
सभी तो सर-ब-सज्दा हैं फुहश तहज़ीब के आगे
सभी तो ज़ुल्म की ताईद में परचम उठाए हैं
मगर कुछ हैं अभी
जो कुव्वत-ए-इज़हार रखते हैं
वो लहजा तीर रखते हैं
ज़बाँ तलवार रखते हैं
हमेशा ज़ुल्म की गर्दन पे आहनी वार करते हैं
यज़ीद-ए-वक़्त की ताईद से इनकार करते हैं
अभी कुछ लोग ज़िंदा हैं
लिखो
लिखना ज़रूरी है!

— Salman Yusuf

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