कुछ इस तरह से तिरा साथ मुझ को हासिल है
सियाह रात में जैसे कि नूर शामिल है
तिरी झलक से मिली है नज़र को रानाई
वगरना दश्त कहाँ देखने के क़ाबिल है
बिखर रही है फ़ज़ाओं में फूल की ख़ुशबू
अजब है फूल कि अपने असर से ग़ाफ़िल है
यहाँ कोई भी नहीं दूर तक निगाहों में
ये दहर है कि किसी अजनबी की महफ़िल है
चला गया है मुसव्विर बना के बस ख़ाका
कहाँ ये शक्ल बिना रंग-ओ-बू के कामिल है
मैं राह अपनी बदल के तो चल पड़ा लेकिन
ये क्या ग़ज़ब है कि तू हर जगह मुक़ाबिल है
— Sanjay Bhat















