ज़िंदगी से ये सिलसिला क्यूँ है
लाज़मी कोई हादिसा क्यूँ है
रहनुमाई तिरी है ये कैसी
मौत ही आख़िरी पता क्यूँ है
फूल कोई नहीं है राहों में
और काँटों का क़ाफ़िला क्यूँ है
तेरे होने से हो रहा है नशा
दिल में साक़ी ये वलवला क्यूँ है
रोज़ चलते हैं तेरी ही जानिब
फिर भी लेकिन ये फ़ासला क्यूँ है
तुझ से दिल भी लगा के देख लिया
तल्ख़ ही तेरा तजरबा क्यूँ है
ज़िंदगी तुझ से किस तरह पूछें
जाने हम से तुझे गिला क्यूँ है
— Sanjay Bhat















