कल ये रिश्ता बदनाम न हो
बेहतर है इस का नाम न हो
ये सोच के उस का काम किया
कल मुझ को उस से काम न हो
क्या आज से पीना छोड़ दिया
इस बात पे फिर क्यूँ जाम न हो
उन लबों का हश्र ख़ुदा जाने
जिन लबों पे जय श्री राम न हो
इस वक़्त को जी भर जी लो तुम
शायद फिर ऐसी शाम न हो
— Satyam Shukla















