चोट मुझ सेे पूछती है
है दवा या दर्द ही है
आनी है तो मौत आए
ये भी तो चारागरी है
है समझ तो दर्द समझे
वो भी आख़िर आदमी है
मैं अकेला ठीक ही हूँ
ये भी तो इक ज़िन्दगी है
बाँटना ग़म सोच कर तुम
बाँटने से लौटती है
— Satyawesh Niraj
है दवा या दर्द ही है
आनी है तो मौत आए
ये भी तो चारागरी है
है समझ तो दर्द समझे
वो भी आख़िर आदमी है
मैं अकेला ठीक ही हूँ
ये भी तो इक ज़िन्दगी है
बाँटना ग़म सोच कर तुम
बाँटने से लौटती है
Other ghazal from the same pen
Shers of alone.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling