मेरी जब भी कोई बात सँवरने लगती है

मसलन बनते बनते बात किनारे लगती है

ये सब कुछ वीराना सा है तेरे जाने से
तेरे आने से मख़्लूक़ चहकने लगती है

मैं जब भी लिखने लगता हूँ तेरे बारे में
काग़ज़ पर तेरी तस्वीर उभरने लगती है

बस इक मैं ही जानू तिरी छुअन के जादू को
छूते ही मेरी तस्वीर महकने लगती है

सारा आलम रौशन है बस तेरे होने से
तेरे नूर से तो चाँदनी भी जलने लगती है

बोसे का सुनते ही तो मुँह फुला लेती है वो
कहता हूँ तो शादी बा'द का कहने लगती है

देखो ऐसी लड़की से फ़ासला ही रखना तुम
जो शान-ओ-शौक़त देख कर फिसलने लगती है

— Saurabh Chauhan 'Kohinoor'

More by Saurabh Chauhan 'Kohinoor'

Other ghazal from the same pen

See all from Saurabh Chauhan 'Kohinoor' →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling