रह-गुज़र से तिरी गुज़रना हैबस यही सुब्ह-ओ-शाम करना हैतेरे कूचे में ही ठहरना हैजीते जी क़ब्र में उतरना हैतुम को ग़ुस्से में देखने के लिएकर के वा'दा मुझे मुकरना हैफिर तुम्हें इज़्तेराब सा क्यूँ हैजबकि इक रोज़ सब को मरना हैगाम दर गाम तेरी यादें हैंरेज़ा रेज़ा मुझे बिखरना है— Shadab Shabbiri