वक़्त रहते सुधर गया आख़िर
घर का भूला था घर गया आख़िर
सर बुलंदी की आरज़ू थी उसे
देखिए उस का सर गया आख़िर
बार-ए-ग़म से दबा हुआ था जो
आज वो शख़्स मर गया आख़िर
यास में जो उठा तिरे दर से
उम्र भर दर-बदर गया आख़िर
वो भला था बुरा था जो भी था
वक़्त ही था गुज़र गया आख़िर
— Shadab Shabbiri















