उन की जानिब से जो मिलने का इशारा मिलता
बेसहारों को भी जीने का सहारा मिलता
हम तो तन्हा ही सफ़र कर रहे हैं बरसों से
क्या ही बेहतर था अगर साथ तुम्हारा मिलता
हम तो सहरा में भी तन्हा ही खड़े हैं ऐ काश
कोई अपनी ही तरह दर्द का मारा मिलता
उस से ज़िद कर के मैं सुनता कोई अपनी ही ग़ज़ल
वो परीज़ाद अगर मुझ को दुबारा मिलता
वो मिला भी तो अधूरा ही मिला है अफ़सोस
काश वो शख़्स हमें सारे का सारा मिलता
एक मुद्दत से समुंदर का सफ़र है दरपेश
इस सफी़ने को ख़ुदा कोई किनारा मिलता
— Shadab Shabbiri















