चाहत ने ला के छोड़ा है ऐसे मुका़म परमैं भी उदास वो भी परेशाँ है आज कलउस के भी रुख़ का रंग ज़रा ज़र्द-ज़र्द हैअपना भी तार-तार गिरेबाँ है आज कल— Shadab Shabbiri