तेरे दर पर तो हम खड़े भी नहीं
यार इतने गिरे पड़े भी नहीं
मान ली है शिकस्त दुनिया ने
जब कि उस से कभी लड़े भी नहीं
जिस तरफ़ भी चले चले ही गए
हम इधर या उधर मुड़े भी नहीं
आप छोटे नहीं हक़ीक़त है
आप लेकिन बहुत बड़े भी नहीं
सर-निगूँ हो गए हैं वो ख़ुद ही
हम तो ज़िद पर कभी अड़े भी नहीं
— Shadab Shabbiri















