ham aashiqane jahaan gham manaane aa.e hain | हम आशिक़ाने जहाँ ग़म मनाने आए हैं

  - Shajar Abbas

हम आशिक़ाने जहाँ ग़म मनाने आए हैं
मज़ार-ए-क़ैस पे शम्मा जलाने आए हैं

ग़म-ए-फ़िराक के मारे हुए तमाम जवाँ
लहद पा क़ैस की मातम मनाने आए हैं

ऐ शहर-ए-क़ैस हमारा तू ख़ैर मक़दम कर
के हम चराग़-ए-अक़ीदत जलाने आए हैं

हम अपने हाल-ए-शिकस्ता को ले के सहरा में
जनाब-ए-क़ैस की सुन्नत निभाने आए हैं

भड़क रहे हैं जो शोले खिलाफ़-ए-इश्क़ 'शजर'
हम अपने ख़ून से उनको बुझाने आए हैं

  - Shajar Abbas

Udas Shayari

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