hamaare qalb se jab bhi sadaa nikalti hai | हमारे क़ल्ब से जब भी सदा निकलती है

  - Shajar Abbas

हमारे क़ल्ब से जब भी सदा निकलती है
ख़ुदा का शुक्र वो बनके दुआ निकलती है

तेरी गली से जो बाद-ए-सबा निकलती है
वो सब मरीज़ों की बनकर दवा निकलती है

ये चाँद तारे भी मद्धम दिखाई पड़ते हैं
तुम्हारे चेहरे से ऐसी ज़िया निकलती है

बहुत तड़पती हैं तुर्बत में ज़ैनब-ए-मुज़्तर
कोई कनीज़ अगर बे रिदा निकलती है

क़लम को जब भी उठाता हूँ मैं शजर ज़ैदी
लम की नोक से तेरी सना निकलती है

  - Shajar Abbas

Ibaadat Shayari

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