bas chale inka to ye ahl-e-jahaan le jaayenge | बस चले इनका तो ये अहल-ए-जहाँ ले जाएँगे

  - Shajar Abbas

बस चले इनका तो ये अहल-ए-जहाँ ले जाएँगे
छीनकर हमसे ज़मीन-ओ-आसमाँ ले जाएँगे

गुलशन-ए-ईजाद तेरा राहज़न ये लूटकर
सोचता हूँ बाग़बाँ आख़िर कहाँ ले जाएँगे

तड़पेंगी दरिया की मौजें लब तक आने के लिए
उस जगह तश्नालबी को तश्नगाँ ले जाएँगे

अर्श-ए-सानी पर चमकने के लिए जान-ए-वफ़ा
हुस्न तुमसे माहताब-ओ-कहकशाँ ले जाएँगे

जंग-ए-आज़ादी को मुर्शिद मुस्कुराकर देखना
फ़तह करके कमसिन-ओ-पीर-ओ-जवाँ ले जाएँगे

हादसात-ए-इश्क़ से महफूज़ रखने के लिए
हम शजर ख़ुद को बचाकर के कहाँ ले जाएँगे

  - Shajar Abbas

Manzil Shayari

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