बस चले इनका तो ये अहल-ए-जहाँ ले जाएँगे
छीनकर हमसे ज़मीन-ओ-आसमाँ ले जाएँगे
गुलशन-ए-ईजाद तेरा राहज़न ये लूटकर
सोचता हूँ बाग़बाँ आख़िर कहाँ ले जाएँगे
तड़पेंगी दरिया की मौजें लब तक आने के लिए
उस जगह तश्नालबी को तश्नगाँ ले जाएँगे
अर्श-ए-सानी पर चमकने के लिए जान-ए-वफ़ा
हुस्न तुमसे माहताब-ओ-कहकशाँ ले जाएँगे
जंग-ए-आज़ादी को मुर्शिद मुस्कुराकर देखना
फ़तह करके कमसिन-ओ-पीर-ओ-जवाँ ले जाएँगे
हादसात-ए-इश्क़ से महफूज़ रखने के लिए
हम शजर ख़ुद को बचाकर के कहाँ ले जाएँगे
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