सियाह कपड़े किए ज़ेब-ए-तन हसीन बशर
तिरे लबों का तबस्सुम सुकून-ए-क़ल्ब-ए-शजर
सियाह कपड़े तुम्हें यूँँ बरा-ए-तोहफ़ा दिए
लगे न बर सर-ए-महफ़िल तुम्हें किसी की नज़र
सवाल पूछे कोई गर हो कौन तुम मेरे
कहूँ हो आँखों की बीनाई तुम हो लख़्त-ए-जिगर
उसे समझते हैं हम कोर-चश्म ईद का दिन
पड़े है चेहरा-ए-अनवर पे जब तुम्हारी नज़र
लहू लुहान हुईं आँखें दिल उदास हुआ
तिरे बग़ैर तसव्वुर किया जो अज़्म-ए-सफ़र
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