हम ख़ुद को चले आए हैं लेकर तिरे दर पर
तू हुस्न की तलवार चला आँखों के सर पर
ये जिस्म से उठने नहीं पाएगी अज़िय्यत
ग़म रख दिये जाएँगे अगर दिल की कमर पर
दामन को किया चाक लहू आँखों से रोए
जब 'इश्क़ के मक़तल में लगी बरछी जिगर पर
यूँँ तख़्त मुहब्बत का मयस्सर नहीं होगा
घर छोड़ के फ़रहाद सा निकलोगे सफ़र पर
अहसास नहीं है मिरी बर्बादी का उनको
जो कहते थे हम जान लुटा देंगे शजर पर
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