तुम पर हुए जो ज़ुल्म-ओ-सितम हज़रत-ए-फ़रहाद
उनको न भूल पाएंगे हम हज़रत-ए-फ़रहाद
जो ग़म उठाए आपने इस राह-ए-इश्क़ में
हम भी उठा रहे हैं वो ग़म हज़रत-ए-फ़रहाद
कूचा ब कूचा परचम-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा लिए
तबलीग़-ए-इश्क़ करते हैं हम हज़रत-ए-फ़रहाद
परचम उठा के 'इश्क़ का कहते हैं नौ जवाँ
झुकने न देंगे हम ये अलम हज़रत-ए-फ़रहाद
जाते थे जैसे आप उसी शान से शजर
जाते हैं देखो कू -ए-सनम हज़रत-ए-फ़रहाद
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