नारा लगाते निकले हैं यूँँ अपने घर से हम
करने लगे हैं सुनिए मोहब्बत शजर से हम
कहते हैं पैरोकार ये लैला-ओ-क़ैस के
डर जाएँ क्यूँँ बताइए दुनिया के डर से हम
दस्त-ए-अदब में परचम-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा लिए
आएँ उधर से आप तो आएँ इधर से हम
सब ने तुम्हारा कह के पुकारा हमें सनम
गुज़रे जिधर जिधर से तुम्हारे नगर से हम
हम को गले लगाओ लो बोसा जबीन का
लौटे हैं आज बरसों में वापस सफ़र से हम
है कैफ़ियत अजीब सी फ़ुर्क़त के बाद से
करते हैं बातें देखिए दीवार-ओ-दर से हम
आकर भँवर में 'इश्क़ की कश्ती उलझ गई
कैसे निकालें बाहर इसे इस भँवर से हम
देखें हमें वो महव-ए-नज़र से मता-ए-जान
देखें मता-ए-जान को महव-ए-नज़र से हम
लिखते हैं ग़ज़लें सारे सुख़नवर सियाही से
लिखते हैं ग़ज़लें दोस्तों ख़ून-ए-जिगर से हम
कलियों से कह रहा है ये गुलशन में एक गुल
करता है 'इश्क़ हमसे शजर और शजर से हम
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