
मोहब्बत करतीं हैं हम उम्र उस की सब गुलाबों से
और इक वो है उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती किताबों से
ग़ज़ल मेरी अधूरी थी 'शजर' सो पूरा करने को
मैं कुछ मौज़ू उठा लाया हूँ "ग़ालिब" के निसाबों से
— Shajar Abbas
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