
तुम्हारा जाना मुनासिब नहीं हैं जान उधर
वहाँ मुनाफ़िक़ हैं सब इश्क़ के इधर को चलो
बहुत उदास है आँगन सनम तुम्हारे बिना
हमारी बात का कर लो यक़ीन घर को चलो
— Shajar Abbas
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