अपने हाथों पे तू क्यूँँ सजाए मुझे
प्यार भी अपना तू क्यूँँ बनाए मुझे
मैं ने तो कुछ किसी का बिगाड़ा नहीं
इतना भी फिर कोई क्यूँँ सताए मुझे
मेरी तलवार से घाव लगता नहीं
अपना क़ातिल भी तू क्यूँँ बनाए मुझे
मान बैठा गुमाँ में ख़ुदा ख़ुद ही को
आइना कोई बंदा दिखाए मुझे
आँखें छोड़े मिलाना नहीं उन्स गर
और है इश्क़ तो फिर बताए मुझे
मैं लिखा हूँ जो तक़दीर में तेरी गर
तेरी औक़ात क्या जो मिटाए मुझे
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