एक मुद्दत से रही पल में चली जाएगीज़िंदगी आज या ये कल में चली जाएगीजो भी आया है यहाँ उम्र बिताने आयाये धरा भी तो रसातल में चली जाएगीचार दिन की ही बची और ख़ुशी है मेरीफिर तो हँसने की रिहर्सल में चली जाएगीहम हैं वो हंस जो बैठे हैं तेरी राह तकेतू वो मछली है जो फिर जल में चली जाएगी— Subodh Sharma "Subh"