दीप फिर से ये जगमगाए हैंराम जी वन से लौट आए हैंआज कोई नहीं निभा पाताराम ने सब वचन निभाए हैंजाति पे तंज़ कसने वालों सेपूछना बेर किस ने खाए हैंराम के दिल में हैं बसी सीताराम को दिल में हम बसाए हैंपैर अंगद सा शीश को कर केराम के दर पे हम जमाए हैं— Subodh Sharma "Subh"