हर रोज़ रोज़ दिल में नया ग़म लिए हुए
बैठे हुए हैं रौशनी मद्धम किए हुए
रोते हुए का हाथ बटाना नहीं कभी
कहना उसे कि हम भी ये आलम जिए हुए
साबित किया था हम ने मोहब्बत को बे-वफ़ा
कपड़े उतार कर के थे परचम सिए हुए
जितनी चढ़ी हैं आज मज़ारों पे चादरें
उतने गुनाह इश्क़ में हैं हम किए हुए
— Subodh Sharma "Subh"















