जीतने का शौक़ था पर मात खानी पड़ गई
इश्क़ शे'र-ओ-शाइ'री में जब ज़बानी पड़ गई
याद से हम ने तेरी हर इक निशानी दूर की
इक घड़ी थी हाथ में जिस की निशानी पड़ गई
आज जब वो लौट कर आया हमारी मौत पर
लग रहा कम एक दिन की ज़िंदगानी पड़ गई
वो मुझे दुनिया कहा करता उसे फिर एक दिन
मुझ को आख़िर-कार दुनिया ही दिखानी पड़ गई
— Subodh Sharma "Subh"















