उसी का अक्स है इस कहकशाँ में
वगरना क्या मैं तकता आसमाँ में
करिश्मा है अजब है इश्क़ में जो
बदन ज़िंदा रहे दो एक जाँ में
मुयस्सर था नहीं साहिल हमें वो
बहा कर ले गया अपनी रवाँ में
अगरचे एक होता तो मैं कहता
बहुत से ऐब थे उस बद-गुमाँ में
उतर आए बग़ावत पर ख़ुदा भी
हमारी कौन सुनता दो-जहाँ में
— Subodh Sharma "Subh"















