हर तरफ़ थी बस घुटन मैं ग़म-ज़दा रोता रहा
सोच कर के मैं सभी अपनी ख़ता रोता रहा
आसमाँ मेरा कहाँ साहब यहाँ फ़िरदौस में
मैं ज़मीं का था ज़मीं पर ही पड़ा रोता रहा
एक ख़्वाहिश दिल में ले के मैं चला था शहर को
छूटती इक रेल को मैं देखता रोता रहा
वो कहानी याद है तुम को वो जिस में एक शब
इक शराबी के विरह पे मय-कदा रोता रहा
— Subodh Sharma "Subh"















