पहले-पहल तो जी का ये जंजाल काट लूँ

मुश्किल मिरे लिए है ये फ़िलहाल काट लूँ

मुझ को शजर से तो है मोहब्बत बहुत मगर
लगने लगी है सर पे जो ये डाल काट लूँ

अब वक़्त आ गया है घरों से निकल चलें
पिछले बरस कहा था, कि ये साल काट लूँ

कहना उसे कि ठीक से सब काम चल रहा
ख़त पे लिखे हुए मैं ख़द-ओ-ख़ाल काट लूँ

— Subodh Sharma "Subh"

More by Subodh Sharma "Subh"

Other ghazal from the same pen

See all from Subodh Sharma "Subh" →

Waqt Shayari

Shers of waqt.

All Waqt Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling