कभी खुली किताब सा था मैं
कभी खुली किताब सा था मैं
किसी हसीं ख़्वाब सा था मैं
जब टूटी नींद तो सवेरों ने बताया
बिस्तर पर बड़ा ही बेताब सा था मैं
कभी खुली किताब सा था मैं
वो आया ही नहीं जिसे पढ़ना था मुझ को
वो रूठा ही जिस से लड़ना था मुझ को
वो सिफ़र था सिफ़र ही रह गया
किसी अनगिनत हिसाब सा था मैं
कभी खुली किताब सा था मैं
— Mohammad Talib Ansari















