चाँद आधा रहा पूरा होता नहीं
मैं भी तन्हा हूँ रातों में सोता नहीं
ज़िंदगी आशिक़ी का सफ़र साथ है
मौत आती नहीं प्यार खोता नहीं
ग़म तुम्हारा सँभाले हुए हैं सखी
देखता है जहाँ दिल ये रोता नहीं
काटता हूँ हँसी से सभी बातों को
ये न समझो मुझे दर्द होता नहीं
चूम कर रोज़ जाता है माथा मेरा
मैं बचाता निशाँ इनको धोता नहीं
— Tiwari Jitendra















