"मैं इंतिज़ार करूँँगा"

न आएँगी कोई तितलियाँ फूलों पर
न आएँगी कभी बहारें मोहब्बत में
आ कर तुम पास मेरा वहम तोड़ दोगी
इन साँसों को गिनते मैं इंतिज़ार करूँगा
वफ़ाएँ किताबें दुआएँ तुम्हारी वो ख़ुश्बू
न फूल ला कर के देगा कोई तोहफ़े में
मगर यूँ ही भटकते मैं इंतिज़ार करूँगा
मैं ने तुम्हारे पाँव देखे कितने प्यारे थे
मगर आएँगे न मेरे साथ दो क़दम भी
तुम ने पहनी थी जो पायल इन
में लगा घुँघरू
चलो तुम मेरे साथ मैं इंतिज़ार करूँगा
तुम्हें देखा आज ये किसी से कह आया
यक़ीनन नाम न लिया मगर कह आया
सुन रहा था कितने ग़ौर से कि जैसे
वो आईना न हो सचमुच में तुम हो
कि कहता वो अगर मुझ से कुछ कहता
न आए तो भी उस का इंतिज़ार करना
यही सोच कर ये सोचा था मैं ने
तुम आओ न आओ मैं इंतिज़ार करूँगा

— Umashankar Lekhwar

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