मिरे हर ख़्वाब की रस्सी में जज़्बा बाँध देती है
अगर ता'लीम अच्छी हो तो लहजा बाँध देती है
ये जीती ज़िंदगी है बस यूँ औलादों की ही ख़ातिर
जो जाती मन्दिरों में माँ तो धागा बाँध देती है
कहाँ मैं होता था चुप अब मगर चुप-चाप पीता हूँ
बहुत जब टूट जाता हूँ तो हाला बाँध देती है
है देती छाँव घर को एक औरत अपने आँचल में
जो बातें अस्मिता की हो तो भाला बाँध देती है
कहीं सोने की चूड़ी आशिक़ी में मुख़्तसर लगती
कहीं गरदन पे आने भर का माला बाँध देती है
— Sarvesh Pandey















