ख़्वाहिशें भी निगूँ नहीं होती
होती तो शक्ल यूँ नहीं होती
है सितम अब उसे गँवा के भी
मुझ को तकलीफ़ क्यूँ नहीं होती
ये तो कहने की बात है साहेब
वर्ना उल्फ़त सुकूँ नहीं होती
टूटता रोज़ है मिरा दिल पर
कोई आवाज़ क्यूँ नहीं होती
— Vineet Dehlvi
होती तो शक्ल यूँ नहीं होती
है सितम अब उसे गँवा के भी
मुझ को तकलीफ़ क्यूँ नहीं होती
ये तो कहने की बात है साहेब
वर्ना उल्फ़त सुकूँ नहीं होती
टूटता रोज़ है मिरा दिल पर
कोई आवाज़ क्यूँ नहीं होती
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