किसी को देख लूॅं जो मैं उसे मैं जान लेता हूँ
भला है या बुरा है वो उसे पहचान लेता हूँ
कहीं आसान होता है छुड़ाना हाथ अपना ख़ुद
कहीं पर ग़म पराए भी दिखें तो ध्यान देता हूँ
नहीं शिकवा मुझे कोई नहीं कोई शिकायत है
मुझे जो लोग कहते हैं वही सब मान लेता हूँ
किसी को मैं नहीं भाता कहीं कुछ और दिक़्क़त है
मगर दिक़्क़त नहीं वो मैं यही ख़ुद मान लेता हूँ
मुझे कोई अगर आँखें दिखाता है दिखा ले फिर
मिरे रखवाल हैं शम्भू यही मैं मान लेता हूँ
मुझे ग़ुस्सा नहीं आता सुना है आज ये मैं ने
हँसी आती है सुन कर तो हँसी पर ध्यान देता हूँ
— Vishakt ki Kalam se















