अदावत दिल में पाले जा रहे हैं
नए शिकवे निकाले जा रहे हैं
सुपुर्द-ए-ख़ाक तय है इस नगर का
मोहब्बत करने वाले जा रहे हैं
उन्हें क्या ख़ौफ़ हो इज़्ज़त का अपनी
जो औरों की उछाले जा रहे हैं
वो पछताएँगे मुस्तक़बिल में अपने
वो जो कल कल पे टाले जा रहे हैं
नमाज़ें छोड़ के जन्नत की ख़्वाहिश
फ़क़त हम ख़्वाब पाले जा रहे हैं
— Waseem Siddharthnagari















