ज़ेहन में कुछ अजीब चल रहा है
अब यहाँ सारा कुछ बदल रहा है
मुझ को जल्दी विदा करो यारो
मेरा होना मुझी को खल रहा है
मेहँदी तुम को न देगी अब ठंडक
इस
में मेरा लहू उबल रहा है
मुझ को बर्बाद करने वाला शख़्स
कर के बर्बाद हाथ मल रहा है
ख़ार की तरह दिख रहा है जो
इक ज़माने में वो कमल रहा है
मुझ को ख़ुद में वो ढालने वाला
ख़ुद किसी दूसरे में ढल रहा है
इश्क़ भी कर लिया है तू ने तो
दिल बता अब तो कब सँभल रहा है
लड़कियो बाल बाँध लो अपने
सख़्त लौंडा यहाँ पिघल रहा है
फूल ये फिर नहीं खिलेंगे कभी
तू इन्हें आँखों से मसल रहा है
— Yuvraj Singh Faujdar















