क़सम लेते ही उस का नाम लोगे

तो इन बातों से कब तक काम लोगे

सफ़र तो फिर ख़त्म हो ही चुका है
कहाँ तक हाथ उस का थाम लोगे

अदावत कर ही लोगे तुम भी मुझ से
मुसीबत में मेरा तुम नाम लोगे

हवा थी वो जिसे तुम ख़्वाब समझे
कहाँ कब तक उसे तुम थाम लोगे

गई वो तुम ने हालत देखी अपनी
पड़े साक़ी से कब तक जाम लोगे

नदामत भी नहीं उस को करम पे
भरम है तुम कहाँ तक ताम लोगे

— Yogamber Agri

More by Yogamber Agri

Other ghazal from the same pen

See all from Yogamber Agri →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling