चाहता हूँ तिरे हर सितम की मुकाफ़ात हो
जो मिरे साथ तू ने किया कल तिरे साथ हो
रोज़ जब सुब्ह उठता हूँ होता है मन यूँ उदास
गोया तेरा बिछड़ना अभी कल ही की बात हो
अपनी ख़ल्वत को ज़ाया न कर ये ख़ुदा की है देन
ताकि तन्हाई में तेरी तुझ से मुलाक़ात हो
और आसान हो ताकि अगली दफ़ा जीतना
मात हो ही रही है तो अच्छी तरह मात हो
पूरे दिन का थका जिस्म है रात का मुंतज़िर
और ये दिल कि जो चाहता ही नहीं रात हो
महफ़िल-ए-ग़ैर में मेरी रुस्वाई के पीछे भी
कुछ तअज्जुब नहीं गर मिरे अपनों का हाथ हो
फिर ही शायद इन आँखों में क़ौस-ए-क़ुज़ह हो अयाँ
'ज़ान' मुमकिन है पहले इन आँखों से बरसात हो
— Zaan Farzaan















