गाह दरिया रहे गाह सहरा रहे
कोई उस से कहो एक जैसा रहे
ऐ मिरे दिल बता ये ज़रूरी है क्या
जो हमेशा से था वो हमेशा रहे
जिन के किरदार अच्छे रहे उम्र भर
ख़ूब बाद-ए-फ़ना भी वो ज़िंदा रहे
तुम तो उन की ही बोली लगे बोलने
साथ उन के मियाँ चार दिन क्या रहे
ख़्वाहिशों के लिए आख़िरी दम तलक
चाहिए आदमी को कि लड़ता रहे
मर गया इश्क़ अगर दुश्मनी ही सही
कम से कम तुझ से कोई तो रिश्ता रहे
सब को समझा के मैं थक चुका हूँ सो अब
जो समझना है जिस को समझता रहे
कोई कैसे ही पाए है याँ ग़म-गुसार
'ज़ान' हम तो सदा ग़म में तन्हा रहे
— Zaan Farzaan














