इस क़दर जीना मिरा मुश्किल न होता
काश या अल्लाह मुझ में दिल न होता
हम-सफ़र बिछड़ा न होता गर सर-ए-राह
मैं अभी शायद सर-ए-मंज़िल न होता
गर पता होता कि वो हासिल न होगा
बा-ख़ुदा मैं भी उसे हासिल न होता
ग़ौर से अब सोचता हूँ जो हुआ था
क्या वो होता मैं अगर ग़ाफ़िल न होता
बस में होता तो बनाता इक नया दहर
जिस में मैं तेरी तरफ़ माइल न होता
क़ुफ़्ल गर होता दर-ए-दिल में वफ़ा का
जुज़ पिया के कोई भी दाख़िल न होता
होता तू महफ़िल का मौज़ू-ए-सुख़न 'ज़ान'
हाँ अगर तू दर-ख़ुर-ए-महफ़िल न होता
— Zaan Farzaan















