पहले ख़ुद को क़ाबिल कर
फिर जो चाहे हासिल कर
जिस से मिलना आसाँ हो
क्या करना उस से मिल कर
आँखों से लेती है काम
वो अक्सर लब को सिल कर
तू है सहरा का इक फूल
क्या ही कर लेगा खिल कर
सोचों तक महदूद न रख
मुझ को दिल में दाख़िल कर
आ ना मेरा हाथ पकड़
साथ निभाएँगे मिल कर
रो मत मुझ को जाने दे
राह न मेरी मुश्किल कर
भीड़ में शामिल क्यूँ होगा
भीड़ को ख़ुद में शामिल कर
'ज़ान' पराई दुनिया में
ख़ुद को ख़ुद पे माइल कर
— Zaan Farzaan















