तू जब बा'द-ए-तर्क-ए-तअल्लुक़ बहुत ख़ुश दिखा तब लगा
कि गोया तिरी ज़ीस्त का अब तलक मसअला मैं ही था
हुआ था जो माज़ी में उस से न कर रोज़-ए-फ़र्दा ख़राब
बहुत कुछ हुआ था मगर क्या हुआ जो हुआ सो हुआ
ये मासूम दिल मेरा अब भी तलाशे है गुंजाइशें
भले ज़ेहन माने कि वो दास्ताँ हो चुकी है फ़ना
गँवा एक दूजे को दोनों ने पाया ही है कुछ न कुछ
किसी को नया हम-सफ़र मिल गया तो किसी को ख़ुदा
मैं ये देख कर ही तो ख़ुश हूँ कि मैं उन की सोचों में हूँ
फिर अब वो सताइश करें या बुराई मुझे उस से क्या
मलाल इस का कब था कि अहद-ए-वफ़ा उस ने तोड़ा था 'ज़ान'
नदामत तो ये थी मैं सब जान कर भी निभाता रहा















