दर-ए-दिल पर ला सको दस्तक रुहानी, क्या सही हो

और तब महताब दिखता हो रुमानी, क्या सही हो

वो अदाकारी दिखाती है, मगर मुझ को पसंद ना
नाम मेरा लिख महेंदी में दिवानी, क्या सही हो

हाथ में मय को पकड़, वो फिर तलब चढ़ती नहीं क्यूँ
इश्क़ में मिल हार जब कोई पुरानी, क्या सही हो

जिस दरीया को बनाते खर्च हुए आँसू मिरे जो
लाश को मेरी मिले तैरने रवानी, क्या सही हो

लोग दिल अपना करे मानिंद पत्थर क्यूँ, मगर फिर
दूसरों से चाहते हैं ज़िंदगानी, क्या सही हो

होश खो देना बुढ़ापे में, बहुत ही आम बातें
डूब ता'रुफ-ए-मदहोशी में जवानी, क्या सही हो

सर-ज़मीन पर बात अब रूकती नहीं है, क्योंकि तेरी
है जगह भी ऊपर वहाँ आसमानी, क्या सही हो

आए ना मुस्कान चहरे पर, ख़ुशियाँ ना, चलेगा
आँसु चहरे पर रखे थोड़ी निशानी, क्या सही हो

झूठ कहते सच मिरा वो लोग, सच उन का अलग सा
चाहते परचम-ए-सच उन की ज़ुबानी, क्या सही हो

मज़हबी बातें करे हैं ये सियासत क्यूँ हमेशा
फिर शुरू होती लड़ाई ख़ानदानी, क्या सही हो

क़ब्र पर मुझ को न छोड़ो फूल तुम, है इलतजा सुन
आँख से गिरता अगर इक बूँद पानी, क्या सही हो

जो अना के बीज बोते, फिर दरख़्तों से बड़े हुए
जब जड़ें इन जंगलों की हो गिरानी, क्या सही हो

— Zain Aalamgir

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