हमको किसी से अब भी मोहब्बत तलब नहीं
इज़्ज़त तलब तो है पर अक़ीदत तलब नहीं
इतना हसीन हैं वो तख़य्युल कि क्या कहें
बस इतना जान लो की हक़ीक़त तलब नहीं
फ़र्त-ए-ख़ुशी से अपनी जो भी रश्क करते हैं
उनको तिरी बनाई वो जन्नत तलब नहीं
बस ख़ुद-कुशी से बचने का ज़रिया है शा'इरी
हमको सुख़न-वरी से तो शोहरत तलब नहीं
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