इक ओर वो सलीक़े से काटे हैं सर मिरा इक ओर मैं कसीदे पढूँ शान-ए-यार मेंहरगिज़ नहीं बनाता मोहब्बत में हिज्र मैंहोता अगर बनाना मेरे इख़्तियार में— Sabir Hussain