ऐसे कुछ मस्ताने निकले
फ़िक्री को झुठलाने निकले
मन-मौजी हो भौंरा देखो
फूलों को बहलाने निकले
दिल की मिट्टी खोदा जब तो
वापस ज़ख़्म पुराने निकले
पहले आग लगाई सबने
फिर सब आग बुझाने निकले
ख़ूब बनाया रिश्ता हम ने
वक़्त पे सब बेगाने निकले
क्या पाया क्या खोया सोचा
कितने लोग सियाने निकले
— Shubham Rai 'shubh'















