आँख पर पट्टी लगा कर गर है चलता आदमी
लाज़मी है ठोकरों से जा गिरेगा आदमी
हाथ तो मौजूद होंगे ज़ुल्म होने पे मगर
कैमरे में क़ैद करता बस मिलेगा आदमी
एक ही रोटी के हिस्से पर लड़ेगे आप हम
भूख हाकिम की मिटेगी और सहेगा आदमी
चोट खाए जिस्म को होगी ज़रूरत ख़ून की
फिर कहाँ ये ज़ात मज़हब बस दिखेगा आदमी
अब नहीं वहशी दरिंदों का यहाँ पर ख़ौफ़ है
ख़ौफ़ है इस दौर में बस आदमी का आदमी
— Aadil Sulaiman















